मनीष सूर्यवंशी (वीर सूर्या टाइम्स )
गोपाल चंद्र मुखोपाध्याय उर्फगोपाल “पाठा” शायद ही यह नाम बहुत कम लोगों ने सुना होगा । भारत में ना जाने ऐसे कितने नायक है जिनको नेहरूवादी व्यवस्था ने गुमनामी के अंधेरों में धकेल दिया । कोलकाता समेत पूरा पश्चिम बंगाल अगर भारत का हिस्सा है तो उसमें गोपाल पाठा का महत्वपूर्ण योगदान है । उन्होंने अपने दम पर कोलकाता में इस्लाम कट्टरपंथियों से मुकाबला किया और हज़ारों हिंदुओं की जान बचाई। गोपाल चंद्र मुखोपाध्याय का जन्म 07 सितंबर 1913 में कोलकाता (तत्कालीन बंगाल, ब्रिटिश भारत) में हुआ था। उन्हें आमतौर पर “गोपाल पाठा” के नाम से जाना जाता था, उनके परिवार की मांस की दुकान थी जिसके कारण उन्हें बचपन में “पाठा” शब्द का उपनाम मिला। आज भी उनकी दुकान कोलकाता के बहुबाजार में स्थित है। इसी दुकान में वह बकरे का मांस को काटकर बेचने का व्यवसाय करते थे, मनुस्मृति के अनुसार व्यवसाय के आधार पर ही उनकी जाति खटीक प्रमाणित होती है क्योंकि जाति वैदिक वर्ण व्यवस्था से शुरू होकर जन्म आधारित कठोर व्यवस्था में बदल गई है। समय के साथ पेशा, सामाजिक संरचना, धर्मशास्त्र, और राजनीतिक लाभ ने इसे स्थायी बना दिया। उनकी जाति विवादास्पद है, वर्तमान में उनके पारिवारिक सदस्य अपने आपको ब्राह्मण बताते हैं। प्रामाणिक तौर पर बंगाल एवं अन्य भारत वर्ष के राज्यों में ब्राह्मणों जाति का कार्य शिक्षा, पूजा, यज्ञ, वेद-पाठ, शास्त्र-चर्चा आदि माना गया। जबकि मांसाहार (खासकर मांस काटना, बेचना या पकाना) को ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध माना गया, इसलिए पारंपरिक रूप से ब्राह्मण जाति के लोग मांस (बकरा) काटने का व्यवसाय नहीं करते थे, और यह काम सिर्फ खटीक (कसाई) जाति से जुड़ा माना जाता था। अगर कहीं कोई करता भी है, तो वह व्यक्तिगत अपवाद है। केरल, बंगाल, असम, नेपाल आदि जैसे क्षेत्रों में ब्राह्मण समुदायों में मछली और मांस खाने की परंपरा रही है। परन्तु मांस काटने या बेचने का व्यवसाय आमतौर पर नहीं करते। परंतु उनके परिवार के लोगों द्वारा अपने आप को ब्राह्मण जाति का कहने वाले उनके पूर्वज गोपाल पाठा, सिर्फ मांस काटने का व्यवसाय करते थे । कुछ खटीक समाज के लोगों ने बताया कि गोपाल पाठा के घर और उनकी दुकान के आसपास खटीक जाति के बाहुल्य घर आज भी है। 1890 के दशक में उनका परिवार कूचबिहार (चौरांगे) जिले, पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) के जिबन्नगर इलाक़े से कोलकाता के बहुबाजार में आकर बस गया था और आज भी वहां मुस्लिम खटीक (कसाई) अधिकांश पाया जाते है। निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की फिल्म “द बंगाल फाइल्स” 1946 के कलकत्ता दंगों पर आधारित है और इस फिल्म में गोपाल पाठा एक केंद्रीय चरित्र भी है और जाति के कारण ही वह किरदार विवादस्पद हो गया है । वे शायद क्रन्तिकारी अनुकुलचन्द्र मुखोपाध्याय के भतीजे थे ।
गोपाल पाठा पर हिंदू चेतना का प्रभाव परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार के माध्यम से पड़ा। जब डॉ. हेडगेवार अपने कलकत्ता प्रवास के दौरान बाऊबाज़ार मार्ग स्थित महाराष्ट्र लॉज में अस्थायी रूप से ठहरे हुए थे और वहीं से हिंदू जागरण का कार्य कर रहे थे, तभी उनकी भेंट गोपाल पाठा से हुई। पहली मुलाकात में डॉ. हेडगेवार ने गोपाल पाठा के हृदय में एक हिंदू रक्षक बनने का बीज बो दिया। बाद में, जब 21 जुलाई 1930 को डॉ. हेडगेवार को जंगल सत्याग्रह के चलते नौ महीने का कारावास हुआ, तब उन्होंने अकोला जेल में रहते हुए ही संपूर्ण देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार की योजना बनाना आरंभ किया। इसी क्रम में उन्होंने बालासाहेब देवरस को कोलकाता भेजा। कोलकाता पहुंचकर बालासाहेब देवरस की मुलाकात पुनः गोपाल पाठा से हुई, और उन्हीं के माध्यम से वहाँ संघ की शाखाएं लगनी शुरू हुईं। इन शाखाओं में स्थानीय युवाओं को मानसिक और शारीरिक रूप से सशक्त बनाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाने लगा। कुछ समय बाद इन युवाओं को हथियार चलाने का प्रशिक्षण भी दिया जाने लगा, ताकि वे आवश्यकता पड़ने पर समाज और राष्ट्र की रक्षा कर सकें। आगे चलकर उन्होंने इसी शाखा से कुछ लोगों को जोड़कर “भारत जातिय बहिनी” की स्थापना की ।
16 अगस्त 1946 का वह दिन जब मोहम्मद जिन्ना के आह्वान पर अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने सुनियोजित तरीके से कोलकाता में हिंदुओं का नरसंहार करना शुरू कर दिया था। इसे इतिहास में “डायरेक्ट एक्शन डे” और “ग्रेट कलकत्ता किलिंग” कहा जाता है । उस समय बंगाल में मोहम्मद जिन्ना समर्थक हुसैन सुहरावर्दी की सरकार थी । हुसैन सुहरावर्दी की सरकार के कट्टरपंथि दंगाइयों द्वारा दो दिनों तक सरेआम हिन्दुओं को काटा जाता रहा । बंगाल की गलियों में चारों तरफ खून ही खून दिखाई दे रहा था, घर दुकानें लूटी जा रही थी। बंगाल के मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा हिन्दू महिलाओं पर भीषण अत्याचार किया जा रहा था, उनका बलात्कार और जबरन धर्मपरिवर्तन किया जा रहा था। मस्जिद से लड़के लेंगे पाकिस्तान के नारे लग रहे थे। हिंदुओं को बचाने वाला कोई नहीं था । मात्र दो दिनों में दस हजार से ज्यादा हिन्दू मारे जा चुके थे। हिंसक माहौल में हुसैन सुहरावर्दी सरकार के आदेशानुसार प्रशासन और पुलिस को निष्क्रिय कर दिया गया। तब ऐसे में गोपाल पाठा ने हाथों में हथियार, लाठी और अन्य साधनों से स्थानीय हिंदू समुदाय की रक्षा के लिए स्वयंसेवी सेना “भारत जातिय बहिनी” का नेतृत्व किया, जिससे कि कई हिन्दुओं का जीवन और सम्मान बच सका । “शठेत् शाठयम् समाचरेत” अर्थात जैसे को तैसा की नीति के अनुसार उन्होंने सरकार को साफ़ साफ कह दिया कि यह मेरा आत्मरक्षा हेतु संकल्प है कि यदि एक भी हिंदू को मारा गया तो बदले में दस मुस्लिम कट्टरपंथि दंगाई मारे जाएंगे । इसके बाद एक ही दिन में बाजी पलट गई जबकि वह पेशे से एक साधारण मांस विक्रेता थे उसके बावजूद मारवाड़ी व्यापारियों ने आर्थिक मदद की और लोहारों ने दिन रात एक कर हथियार बनाएं । हथियार बनने के पश्चात जब उनके अपने लोगों पर कट्टरपंथियों द्वारा हमला हुआ तब वह बन गया धर्म का रक्षक । उनका नेतृत्व पाकर पूरा हिंदू समाज एकजुट हो गया। अब तक चुप्पी साधे अंग्रेज भी जाग गए, गांधीजी को भी अचानक अहिंसा की याद आ गई और वह भी दंगा रोकने की अपील करने लगे। कांग्रेस और गांधीजी को बंगाल में अपने नेतृत्व में खतरा दिखने लगा। ऐसा माहौल बनाया की हिन्दू ही दंगाई है और मुस्लिम पीड़ित । गांधीजी बंगाल पहुंचकर आमरण अनशन शुरू कर दिया, उन्होंने सिर्फ हिंदुओं से हथियार डालने की अपील की । कुछ लोगों ने हथियार डाल भी दिए परंतु गोपाल पाठा ने कहा कि “तलवार तो दूर यदि किसी लोहे की कील से भी एक हिंदू की रक्षा होती हो तो उसे में गांधीजी के आगे नहीं डालूंगा” । बेचैन गांधीजी ने उन्हें अपने पास तीन चार बुलाया, पर वह नहीं गए। कुछ दिनों पश्चात खुद गांधी जी उनसे मिलने बहुबाजर गए । गांधीजी ने उन्हें शांति और अहिंसा का संदेश सुनाना शुरू कर दिया, जवाब में गोपाल पाठा ने उत्तर दिया कि भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि “अत्याचार को सहने वाला, अत्याचार को करने वाले से बड़ा पापी होता है”। यह सुनने के बाद गांधीजी को कोई जवाब नहीं सुझा और चुपचाप वहां से चले गए। उस समय गोपाल पाठा पूर्वी भारत में सबसे लोकप्रिय हो गए, करोड़ों अनाथ हिंदुओं ने उन्हें अपना उद्धारक और रक्षक मान लिया। जिन्ना की मुस्लिम लीग को उम्मीद थी कोलकाता में हिंदुओं को मरवाकर और धर्म परिवर्तन करवरकर कोलकाता को खाली करवाकर पाकिस्तान में शामिल कर दिया जायेगा। लेकिन गोपाल पाठा ने उनकी इस योजना को धराशाई कर दिया, उनकी रणनीति ने पश्चिमी बंगाल, कोलकाता को बचा लिया और साथ ही लाखों हिन्दुओं के नरसंहार होने से बचा लिया । वर्ना आज कोलकाता समेत पूरा पश्चिमी बंगाल पाकिस्तान (वर्तमान में बांग्लादेश) के अधीन होता, हिंसा के बाद उन्होंने लाखों लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया और महिलाओं एवं परिवारों को आश्रय भी दिया।
उनकी विरासत आज भी दो दिशाओं में विभाजित है, कुछ उन्हें वीर और हिंदू रक्षक मानते हैं, तो कुछ आलोचक उन्हें हिंसा का प्रतीक के तौर पर देखते हैं। आधुनिक समय में, जैसे फिल्म और सार्वजनिक बहस में उनका चित्रण सामने आया, इस विभाजन को और गहरा कर रहा है। कोलकाता के हजारों हिंदुओं को जिहादी नरसंहार से बचाने वाले हिंदू धर्म रक्षक वीर योद्धा गोपाल पाठा ने स्वतंत्रता के पश्चात गुमनामी का जीवन व्यतीत किया। कांग्रेस की तत्कालीन सरकारों और वामपंथी विचारधारा की सरकारों ने उनके साथ दुश्मन सा व्यवहार किया। इतिहास की किताबों में उनका नाम कहीं भी नहीं मिलेगा और यदि लिखा भी है तो उन्हें गुंडा बताया गया है। गोपाल पाठा का निधन फरवरी 2005 वर्ष में हुआ, ऐसे हिन्दू धर्म रक्षक वीर योद्धा को नमन

