
ललिता अध्यापक (वीर सूर्या टाइम्स )
दहेज की आग में जलती, बहुविवाह की बेड़ियों में जकड़ी, पिता–पति की संपत्ति में हिस्सेदारी को तरसती, प्रसव वेदना में भी काम करने को मजबूर — वह नारी, जिसे कभी मतदान का अधिकार नहीं था, जिसे शिक्षा से अछूत बना दिया गया था — उसी नारी के लिए नारायण बनकर आए भारत रत्न डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर।
शिक्षा को “शेरनी का दूध” कहने वाले संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर ने जब नारी के लिए शिक्षालयों के द्वार खोले, तो मानो अंधेरे युग में उजाले की पहली किरण फूट पड़ी।
उन्होंने नारी को न केवल शिक्षित होने का अधिकार दिया, बल्कि बराबरी से जीने की ताकत भी दी।
उनकी कलम से निकला संविधान नारी के हर अधिकार का प्रहरी बन गया —
संपत्ति में समान अधिकार, मतदान का अधिकार, तलाक का हक़, और स्वैच्छिक जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता — ये सब बाबा साहब के दूरदर्शी विचारों की ही देन हैं।
अमेरिका से भी पहले मैटरनिटी लीव (प्रसव अवकाश) देने का कानूनी हक भारत की नारी को बाबा साहब ने दिलाया।
उन्होंने साबित किया कि भारत की नारी किसी से पीछे नहीं, बस अवसर और सम्मान चाहिए।
आज जब नारी समानता, संपत्ति, सुरक्षा और समरसता की राह पर आगे बढ़ रही है, तो यह बाबा साहब के संघर्ष का सुखद परिणाम है।
बाबा साहब की दिखायी राह पर चलना आसान नहीं, पर असंभव भी नहीं।
अगर बाबा साहब को मानने वाले लोग नारी के कदमों में जंजीर बनने के बजाय ताकत बन जाएं, तो दिल्ली क्या — पूरा देश नारी सशक्तिकरण का प्रतीक बन सकता है।
आज जरूरत है कि हम केवल दीवारों पर बाबा साहब की तस्वीरें न टांगे, बल्कि उनके विचारों को जीवन में उतारें।
50 सालों में जो नहीं हो सका — वह अब हो सकता है।
जीएसटी के बड़े दफ़्तरों में, यूनियन की बड़ी कुर्सियों पर अब नारी को बैठना होगा, नीतियां बनानी होंगी, और बदलाव की नई परिभाषा लिखनी होगी।
बाबा साहब का सपना “शक्तिशाली नारी” तभी साकार होगा जब हम सब उनकी बेटी के बढ़ते कदमों में बाधा नहीं, बल्कि सहारा बनेंगे।
मैं, ललिता अध्यापक, बाबा साहब की दिखाई राह पर चल रही हूं।
रुकना नहीं जानती, झुकना नहीं जानती।
मैं उन सभी से कहना चाहती हूं —
“अब नहीं तो कब, और हम नहीं तो कौन?”
आज का अवसर सिर्फ मेरा नहीं, हर उस नारी का है जो सम्मान और अधिकार की हक़दार है।
आइए, बाबा साहब के सपनों को साकार करने के लिए एकजुट हों,
क्योंकि जब नारी जीतेगी — तभी देश जीतेगा।

