जनपक्ष, संस्थान और पत्रकारिता:गोविंद पंत राजू की चार दशकों लंबी यात्रा

हिमांशु जोशी (वीर सूर्या टाइम्स )
वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू की पत्रकारिता यात्रा भारतीय मीडिया के उस दौर से शुरू होती है, जब संसाधन सीमित थे, तकनीक साधारण थी और पत्रकारिता पूरी तरह ज़मीन से जुड़ी हुई थी। लगभग चार दशकों में फैली उनकी यह यात्रा जनपक्षधरता, पेशेवर ईमानदारी और संस्थागत संघर्षों की कहानी है, जो स्थानीय अख़बारों से लेकर अंतरराष्ट्रीय अभियानों तक पहुँची।
गोविंद पंत राजू को लिखने का शौक स्कूल और कॉलेज के दिनों से ही था। छात्र पत्रिकाओं में लेखन और संपादन करते हुए उन्हें जल्दी ही यह समझ आ गया था कि बंधी-बंधाई नौकरी और तय समय की दिनचर्या उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं है। यही सोच आगे चलकर उनके पत्रकारिता जीवन की नींव बनी।
इतिहास में पीएचडी करते हुए उन्होंने सामाजिक आंदोलनों पर शोध किया और कुमाऊँ विश्वविद्यालय में अध्यापन भी किया। कक्षाओं की लोकप्रियता के बावजूद उन्हें महसूस हुआ कि अकादमिक ढाँचे में रचनात्मक स्वतंत्रता सीमित है। इसी दौरान वीडियोग्राफी और डॉक्यूमेंट्री बनाने का सपना उनके भीतर आकार लेने लगा।
पत्रकारिता की असली समझ उन्हें नैनीताल से प्रकाशित जनपक्षीय अख़बार ‘नैनीताल समाचार’ से मिली। यह अख़बार उनके लिए केवल मीडिया संस्थान नहीं, बल्कि विचार और बहस का मंच था। यहीं से उन्होंने पत्रकारिता को सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखना सीखा।
इसके बाद वे जनसत्ता और नवभारत टाइम्स के लिए उत्तराखंड से रिपोर्टिंग करने लगे। टेलीग्राम के दौर में खबरें भेजते हुए उन्होंने राष्ट्रीय मीडिया में अपनी पहचान बनाई। वर्ष 1984 में टाइम्स ऑफ इंडिया के लखनऊ संस्करण से जुड़ने के बाद 1992 तक का समय जोखिम भरी रिपोर्टिंग का रहा। नेपाल आंदोलन से लेकर राजनीतिक अस्थिरता तक, कई अहम खबरें उन्होंने व्यक्तिगत जोखिम उठाकर कीं।
इसी दौरान वेतन असमानता को लेकर पत्रकार यूनियन का आंदोलन शुरू हुआ। यह संघर्ष केवल वेतन का नहीं, बल्कि पेशेवर सम्मान और समान अधिकारों का था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा और पत्रकारों ने कानूनी लड़ाई जीती। इसके बावजूद प्रबंधन ने लखनऊ संस्करण बंद कर दिया, जिसके खिलाफ फिर अदालत का दरवाज़ा खटखटाया गया।
संस्थान से अलग होने के बाद गोविंद पंत राजू ने फ्रीलांसिंग का रास्ता चुना। BBC के लिए स्टिंगर के रूप में काम करते हुए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता के मानकों को करीब से समझा। इसके बाद ANI और आज तक के शुरुआती दौर में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई।
उनके जीवन का सबसे विशिष्ट अध्याय अंटार्कटिका अभियान रहा। भारत सरकार की चयन प्रक्रिया पार कर वे अंटार्कटिका पहुँचे और वहाँ से समाचार भेजने वाले देश के पहले पत्रकार बने। अंटार्कटिका में अनुशासन, पर्यावरण संरक्षण और समान जिम्मेदारियों का अनुभव उनके जीवन का अविस्मरणीय हिस्सा बना।
गोविंद पंत राजू की कहानी उस पत्रकारिता की कहानी है, जो सत्ता से सवाल करती है, समाज से जुड़ी रहती है और हर दौर में अपनी भूमिका को नए सिरे से परखती है।

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