आंदोलनों की आवाज बनते हैं गुमनाम पत्रकार, लेकिन जीत के बाद कौन याद करता है उन्हें?

सी एम जेन | वीर सूर्या टाइम्स
जब कोई आंदोलन सफल होता है, तो उसके नेता, नायक और प्रमुख चेहरे इतिहास में दर्ज हो जाते हैं। मंचों पर उनका सम्मान होता है, तस्वीरें प्रकाशित होती हैं और उनकी भूमिका की चर्चा की जाती है। लेकिन उस आंदोलन की आवाज को समाज और देश तक पहुंचाने वाले पत्रकारों का योगदान अक्सर चर्चा से बाहर रह जाता है।
सवाल यह है कि क्या किसी आंदोलन की सफलता में पत्रकार की भूमिका को भी उतना ही महत्व दिया जाता है?
एक स्वतंत्र पत्रकार किसी राजनीतिक दल या बड़े संगठन के सहारे के बिना जनता के बीच पहुंचता है। वह समस्याओं को देखता है, लोगों की बात सुनता है, तथ्यों को जुटाता है और उन्हें समाचार के माध्यम से समाज तथा शासन-प्रशासन के सामने रखता है। कई बार स्थानीय स्तर पर प्रकाशित एक छोटी-सी खबर ही बड़े बदलाव की शुरुआत बन जाती है।
स्थानीय पत्रकारिता की अहम भूमिका
बड़े मीडिया संस्थानों की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन स्थानीय पत्रकारिता भी लोकतंत्र की मजबूत नींव है। स्थानीय पत्रकार अपने क्षेत्र की समस्याओं को सबसे करीब से समझता है। सड़क, नाली, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासनिक लापरवाही और जनता की अन्य समस्याओं को वह लगातार उठाता है।
कई बार यही खबरें आगे चलकर आंदोलन का रूप लेती हैं और संबंधित विभागों को कार्रवाई के लिए मजबूर करती हैं।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जब समस्या का समाधान हो जाता है, तो उस खबर को सामने लाने वाले पत्रकार को बहुत कम लोग याद रखते हैं।
पत्रकार को भी सम्मान और सुरक्षा की जरूरत
पत्रकारिता केवल कैमरा या कलम चलाने का नाम नहीं है। इसके पीछे मेहनत, समय, आर्थिक खर्च और कई बार व्यक्तिगत जोखिम भी जुड़ा होता है।
स्वतंत्र पत्रकारों को कभी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है तो कभी खबरों को लेकर दबाव और विरोध का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में समाज और संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे निष्पक्ष एवं तथ्यपरक पत्रकारिता करने वालों का मनोबल बढ़ाएं।
इतिहास में पत्रकार का नाम भी दर्ज होना चाहिए
किसी आंदोलन का इतिहास लिखते समय केवल यह दर्ज नहीं होना चाहिए कि किसने आंदोलन का नेतृत्व किया। यह भी दर्ज होना चाहिए कि किसने उसकी आवाज जनता तक पहुंचाई।
किसने पहली खबर प्रकाशित की?
किसने मौके पर जाकर लोगों की बात सुनी?
किसने प्रशासन से सवाल पूछा?
किसने उस मुद्दे को लगातार उठाया?
इन सवालों के जवाब भी इतिहास का हिस्सा होने चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में आंदोलन सड़क पर दिखाई देता है, लेकिन उसकी आवाज दूर तक पहुंचाने का काम पत्रकारिता करती है।
मंच पर दिखाई देने वाले चेहरों के साथ उन पत्रकारों को भी याद किया जाना चाहिए, जो कैमरे के पीछे खड़े होकर जनता की आवाज को देश तक पहुंचाते हैं।
यही पत्रकारिता का वास्तविक सम्मान होगा और यही लोकतंत्र के उन प्रहरी का सम्मान होगा, जो बिना किसी बड़े मंच के लगातार अपना कर्तव्य निभाते हैं।

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