“मुसहर जाति : बिहार के सबसे वंचित समुदाय की सच्चाई”

विकास खतौलिया ( वीर सूर्या टाइम्स ) भारत एक विविधताओं वाला देश है जहाँ अनेक जातियाँ, धर्म और समुदाय रहते हैं। इनमें से कुछ जातियाँ ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी रहीं। बिहार जैसे राज्य में जहाँ गरीबी और सामाजिक विषमता लंबे समय से बनी हुई है, वहाँ मुसहर जाति सबसे अधिक वंचित समुदायों में गिनी जाती है। मुसहर जाति को अनुसूचित जातियों की श्रेणी में रखा गया है, परंतु आज भी यह समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी है। अस्पृश्यता के कारण जो लोग इनके हाथ का पानी पीना पसंद नहीं करते है, वह इनके हाथों से शराब भी पी लेते है। अन्य समाज की शादी समारोह आदि कार्यक्रमों में इनका जाना वर्जित है। स्वर्ण समाज को तो छोड़िए, अनुसूचित जाति की कुछ जातियां भी इनसे भेदभाव करती है। गरीबी के कारण इस जाति के अधिकांश लोग अवैध रूप से शराब बेचने का कार्य भी करती है, जबकि बिहार में शराब बंद है।
“मुसहर” शब्द की उत्पत्ति “मूस” (चूहा) से मानी जाती है और इसका मतलब है, मुस+हर यानी की मुस को हरने वाला। पुराने समय में यह जाति खेतों में मजदूरी करती थी और अत्यधिक गरीबी के कारण चूहे पकड़कर भोजन के रूप में उपयोग करती थी, यही उनकी पहचान बन गई। सच मानिए तो यह लोग वर्तमान समय से पूर्व 18वीं सदी में जी रहे है, इनके रहन सहन का तरीका सदियों पुराना है इसलिए यह लोग समाज की मुख्यधारा से बिल्कुल कटे हुए है। ये मुख्यतः कृषि मजदूर तो रहे, पर कभी भी लेबर कार्ड जैसी सरकारी सुविधा का लाभ नहीं ले सके और कभी भी इस जाति के लोग भूमि या संपत्ति के मालिक नहीं बन पाए, इस सामाजिक व्यवस्था के कारण ही इन्हें ग़रीबी, अशिक्षा और भेदभाव की गहरी खाई में धकेल दिया है । मुसहर जाति मुख्य रूप से बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के कुछ हिस्सों में निवास करती है। कुछ जगह इन्हें ऋषिदेव,” “सदा,” “माझी,” “बनबासी,” “भुइयां,” और “राजावार” जैसे नामों से भी जाना जाता है । अकेले बिहार में इनकी जनसंख्या लगभग 30 से 40 लाख के बीच मानी जाती है और यह बिहार की अनुसूचित जातियों में एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व भी करती है, इस श्रेणी में आने वाली यह तीसरी बड़ी जाति है। आज भी यह समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी है। इस जाति की सामाजिक स्थिति आज भी अत्यंत दयनीय है। यह समुदाय प्रायः ग्रामीण इलाकों में “मुसहरी टोला” या “मुसहरी बस्ती” में रहता है, जो प्रायः गाँव के किनारे स्थित होती हैं, जहाँ सुविधाओं का गंभीर अभाव है। ऐतिहासिक रूप से मुसहर जाति को समाज में “अस्पृश्य” माना गया, आज भी इनसे सामाजिक दूरी बनाई जाती है। इनका रहन-सहन समाज के निचले स्तर पर है। इस जाति का सामाजिक बहिष्कार अब भी बना हुआ है इसलिए मंदिरों में प्रवेश न मिलना या सामूहिक आयोजनों में भेदभाव जैसी समस्याएँ आज भी प्रचलित हैं। इसी कारण इस जाति के गाँवों में अलग टोले में रहने के लिए मजबूर है।
स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण के क्षेत्र में भी इनकी स्थिति बेहद खराब है। अधिकांश मुसहर बस्तियों में शुद्ध पानी, शौचालय और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच सीमित मात्रा में है । अधिकतर मुसहर परिवार कुपोषण, बीमारियों और अशुद्ध जल के उपयोग से प्रभावित रहते हैं। नशाखोरी, बाल श्रम और बाल विवाह जैसी कुरीतियाँ गरीबी और अशिक्षा के कारण अब भी आम हैं। जिससे गरीबी पीढ़ी दर पीढ़ी बनती चली जा है। वैसे समाज के कुछ हिस्सों में भले ही स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है, लेकिन व्यापक रूप से यह जाति अब भी सामाजिक मुख्यधारा से बहुत दूर है।
शिक्षा किसी भी समुदाय, समाज के विकास की कुंजी होती है, इसलिए कहा जाता है कि “शिक्षा शेरनी का वह दूध है, जो पियेगा वहीं दहाड़ेगा।” पर मुसहर समाज का इस विषय में अत्यंत चिंताजनक है। मुसहर जाति के लोगों का कहना है कि “खाने को पैसा नहीं पढ़ाई कहां से करे”। बिहार सरकार की रिपोर्टों के अनुसार, मुसहर समुदाय की साक्षरता दर केवल 10–20 प्रतिशत के बीच है, जो राज्य की औसत दर से बहुत कम है। महिलाओं में साक्षरता दर तो और भी कम, लगभग 5 प्रतिशत है। इसका प्रमुख कारण है गरीबी, अभिभावकों की जागरूकता की कमी, बाल श्रम, और विद्यालयों तक पहुँच की समस्या प्रमुख हैं। बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर सबसे अधिक इन्हीं में देखी जाती है। मुसहर जाति शिक्षा के क्षेत्र में सबसे अधिक पिछड़ी हुई है। हालाँकि सरकार की कई योजनाएँ लागू हुई जैसे मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना, महादलित शिक्षा कार्यक्रम और विद्यालय भोजन योजना से कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन वास्तविक परिवर्तन अभी बहुत कोसों दूर है। शिक्षा की कमी के कारण मुसहर समाज आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से आगे नहीं बढ़ पा रहा।
आर्थिक रूप से मुसहर जाति बिहार की सबसे गरीब जातियों में गिनी जाती है। अधिकतर मुसहर भूमिहीन मजदूर हैं इसलिए वे खेतों में मजदूरी, झाड़ू लगाना ईंट-भट्ठों पर काम या अन्य दिहाड़ी कार्य करते हैं। शहरी क्षेत्रों में भी ये झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं और असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। मनरेगा जैसी योजनाओं से आंशिक लाभ हुआ है, परंतु नियमित रोजगार नहीं मिल पाता और सरकार तंत्र द्वारा भ्रष्टाचार के कारण इसका लाभ पूरी तरह इनको नहीं मिल पाता।
वैसे मुसहर जाति के उत्थान के लिए 20 वर्षो से अधिक समय से समाजसेवी भीम सिंह भावेश अच्छा कार्य रहे है, उन्हें 25 जनवरी 2025 को महामहिम राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू जी द्वारा “पदम श्री” सम्मान प्राप्त हुआ है।  राजनीतिक दृष्टि से मुसहर जाति लंबे समय तक मुख्यधारा की राजनीति से वंचित रही, इनको कोई बड़ा नेता या राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं रहा। हालांकि मुसहर जाति को अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त है, पंचायत स्तर पर अब मुसहर समुदाय के कुछ प्रतिनिधि चुने जाने लगे हैं, परंतु राज्य या राष्ट्रीय राजनीति में अब भी इनकी भागीदारी नगण्य है। एनडीए गठबंधन समर्थित नीतीश सरकार ने इन्हें “महादलित वर्ग” में शामिल किया, जिससे कुछ योजनाओं का लाभ इनको मिलने लगा । जिनमें मुख्यमंत्री अत्यंत पिछड़ा वर्ग, महादलित विकास मिशन, मुसहर विशेष शिक्षा कार्यक्रम, महादलित आवास योजना, मुसहर बस्तियों में प्राथमिक विद्यालय और आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थापना करना भी प्रमुख है । हालांकि इन योजनाओं का प्रभाव अभी सीमित है, क्योंकि ज़मीनी स्तर पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही बड़ी बाधा हैं। अक्सर योजनाओं का लाभ बिचौलियों या अन्य प्रभावशाली वर्गों तक सीमित रह जाता है इसलिए वर्तमान समय में मुसहर जाति के समग्र विकास के लिए निम्नलिखित ठोस कदम उठाना आवश्यक हैं।
हालांकि सरकार और समाज के प्रयासों से अब कुछ परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं, परंतु उचित विकास के लिए आवश्यक है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मान । इन चारों क्षेत्रों में उन्हें समान अवसर देना आवश्यक है।
जब तक मुसहर समाज मुख्यधारा में नहीं आता, तब तक बिहार का सामाजिक विकास अधूरा रहेगा इसलिए मुसहर जाति बिहार की उस सामाजिक सच्चाई का प्रतीक है, जो बताती है कि विकास योजनाओं के बावजूद समाज के निचले तबके तक समान अवसर नहीं पहुँच पाए हैं।

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