मनीष सूर्यवंशी (वीर सूर्या टाइम्स )
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास कई वीरांगनाओं और शूरवीरों के बलिदानों से भरा पड़ा है, लेकिन दुखद यह है कि उनमें से अधिकांश का नाम आज हमारी किताबों और स्मृतियों में कहीं दर्ज नहीं है। ऐसी ही एक भुला दी गई नायिका थीं मंगळू देवी खटीक, जिन्होंने 1890 में आंध्र प्रदेश की धरती पर अंग्रेजी हुकूमत को कड़ा सबक सिखाया।
कहानी है विजयवाड़ा और उसके आसपास के जंगलों की, जहां अंग्रेजी शासन आम लोगों पर तरह-तरह के अत्याचार कर रहा था। किसानों से जबरन कर वसूला जा रहा था, महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता था और समाज को दबा देने की कोशिश की जाती थी। इन्हीं परिस्थितियों में खटीक समाज की बहादुर महिला मंगळू देवी ने प्रतिकार का बिगुल बजाया।
कहा जाता है कि 1890 में अंग्रेजी सेना का एक दल आंध्र प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र में प्रवेश कर रहा था। मंगळू देवी, जो बंदूक चलाने और युद्धनीति दोनों में निपुण थीं, उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ एक योजना बनाई। वह पास के एक बड़े पेड़ पर चढ़ गईं और अंग्रेजी सैनिकों पर नजर जमाए बैठीं। जैसे ही अवसर मिला, उन्होंने अपनी बंदूक से गोलियों की बौछार कर दी और देखते ही देखते 28 अंग्रेज सैनिक वहीं ढेर हो गए।
मंगळू देवी केवल एक योद्धा ही नहीं थीं, बल्कि वे महिला क्रांतिकारी सेना का हिस्सा भी थीं, जो स्थानीय स्तर पर गुप्त रूप से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह को हवा देती थी। उनकी बहादुरी ने ग्रामीण समाज में नया उत्साह जगाया और कई महिलाओं को स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ने की प्रेरणा दी।
लेकिन अफसोस की बात यह है कि जिस देश के लिए उन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगाई, उसी आजाद भारत ने उन्हें भुला दिया। न तो उनके नाम का उल्लेख हमारी पाठ्यपुस्तकों में है, न ही हमारे इतिहास में उन्हें वह पहचान मिल सकी जिसकी वह सच्ची हकदार थीं।
आज जब हम स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हैं, तो यह आवश्यक है कि मंगळू देवी खटीक जैसी नायिकाओं को भी इतिहास के पन्नों पर उचित स्थान दिया जाए। वे केवल आंध्र प्रदेश की ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की धरोहर हैं। उनकी शौर्यगाथा हमें यह सिखाती है कि स्वतंत्रता केवल पुरुषों के बलिदान से नहीं, बल्कि महिलाओं के अदम्य साहस और योगदान से भी संभव हुई थी।
साभार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म

