“विवाद नहीं, विचार: खटीक समाज में आत्मसम्मान और एकता की चर्चा”

वीर सूर्या टाइम्स | विशेष संवाददाता
नई दिल्ली। शाम का समय था। समाज के वरिष्ठजन, युवा और महिलाएं एक ही छत के नीचे बैठे थे। विषय न कोई विवाद था, न कोई आरोप—बस एक सवाल, जो लंबे समय से कई दिलों में पल रहा था क्या हमारी पहचान ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है

खटीक समाज के भीतर यह सवाल इन दिनों गहन चर्चा का विषय बना हुआ है। कुछ लोग अपने नाम के साथ “खटीक” शब्द नहीं लिखते, तो कुछ इसे समाज से दूरी मान लेते हैं। लेकिन इसी बहस के बीच वरिष्ठ बुद्धिजीवियों ने एक ऐसा संतुलित विचार रखा, जिसने माहौल को सोच में बदल दिया।
वही पूर्व में सैनिक रहे सुनील फौजी नें कहां अगर हम किसी को रोज़गार, सुरक्षा या सम्मान नहीं दे सकते, तो हमें उसके हालात पर सवाल उठाने का अधिकार भी नहीं है।

वही फौजी नें बताया कि आज के दौर में समाज के कई भाई-बहन कथा, जागरण और धार्मिक कार्यों से आजीविका चलाते हैं, तो कई सरकारी, निजी सेवाओं और बड़े व्यवसायों से जुड़े हैं। कुछ उच्चस्तरीय सोसाइटियों में रहते हैं, जहाँ सामाजिक दबाव उनकी पहचान को सीमित कर देता है। ऐसे में पहचान छुपाना डर नहीं, मजबूरी भी हो सकती है।

लेकिन इसी के साथ यह बात भी स्पष्ट की गई कि जहाँ समाज साथ रहता है गांवों, कॉलोनियों और मोहल्लों में वहाँ अपनी पहचान से पीछे हटना उचित नहीं। पहचान छुपाने से समाज कमजोर नहीं, बल्कि बिखरता है।
इसी कड़ी में चर्चा के दौरान यह भी सामने आया कि खटीक समाज के लोग “सोनकर”, “सूर्यवंशी”, “धनकर”, “चक” जैसे टाइटल और गोत्रों के माध्यम से भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं । ये केवल नाम नहीं, बल्कि उस गौरवशाली इतिहास की कड़ी हैं, जो समाज को उसकी जड़ों से जोड़ती हैं। कहा गया कि समाज के गोत्रों का बड़ा हिस्सा क्षत्रिय परंपराओं से मेल खाता है, जो शौर्य और स्वाभिमान का प्रतीक है।
वही पत्रकार मनीष सूर्यवंशी नें बताया की इतिहासकारों क़े अनुसार खटीक समाज की जड़ें प्राचीन भारतीय सभ्यता में गहराई तक फैली हुई हैं। यह समाज सदैव कर्मप्रधान रहा जिसने मेहनत, साहस और सेवा को जीवन का आधार बनाया। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक, समाज के अनगिनत लोगों ने बिना शोर किए देश और समाज की सेवा की।
सूर्यवंशी नें आगे बताया अपनी पहचान पर गर्व करो, इतिहास को जानो और भविष्य को गढ़ो।
उन्हें शिक्षा, खेल, सामाजिक सेवा और संगठन में आगे आने का आह्वान किया गया। साथ ही, मृत्यु भोज जैसी कुप्रथाओं को समाप्त करने और विवाह में फिजूलखर्ची से बचने की अपील भी की गई।

समाज में मतभेद होंगे, आलोचनाएं भी आएंगी, लेकिन जो समाज अपने बुजुर्गों, माताओं और बहनों का सम्मान करता है, वही आगे बढ़ता है। पारिवारिक विवादों में तमाशबीन बनने के बजाय समाधानकर्ता बनने की जरूरत है।
“हमारी पहचान हमें बाँटने के लिए नहीं, जोड़ने के लिए है।”
खटीक समाज भी आज इसी सोच के साथ आगे बढ़ने का संकल्प ले रहा है
जहाँ इतिहास गर्व बने, पहचान शक्ति बने और एकता भविष्य की नींव।

इतिहास हमारा गौरव है,
एकता हमारी ताकत
और भविष्य हमारा लक्ष्य।

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