Sen मथुरा (वीर सूर्या टाइम्स)।
ब्रज परिक्रमा मार्ग पर स्थित गांव अभयपुर का वह तालाब, जिसे ग्रामीण बीते कई दशकों से सूखा, उपेक्षित और मृत मान चुके थे, आज पानी से लबालब भरकर ओवरफ्लो हो गया है। करीब छह दशक बाद तालाब में इस तरह पानी भरना केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि सतत संघर्ष, अडिग संकल्प और जनसहयोग से रचा गया ऐतिहासिक क्षण बन गया है।
तालाब के भरते ही पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल बन गया। बुजुर्ग, युवा, महिलाएं और बच्चे इस दृश्य को अपनी आंखों से देखने तालाब की ओर उमड़ पड़े। वर्षों की निराशा के बाद लौटी इस उम्मीद ने ग्रामीणों की आंखों को नम कर दिया। कई बुजुर्गों ने कहा—“हमने अपने जीवन में तालाब को कभी इतना भरा हुआ नहीं देखा।” यह दृश्य केवल जलभराव का नहीं, बल्कि टूटते विश्वास के फिर से जीवित होने का प्रतीक था।
इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष चौधरी की वर्षों की मेहनत, अथक प्रयास और मजबूत इच्छाशक्ति है। विपरीत परिस्थितियों, प्रशासनिक उदासीनता और शारीरिक चोटों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। कड़कड़ाती ठंड और शीतलहर के बीच अपने सहयोगियों के साथ दिन-रात जुटे रहकर उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया।
तालाब के ओवरफ्लो होते ही किसानों के चेहरों पर भी रौनक लौट आई है। लंबे समय से गिरते भूजल स्तर, खारे पानी और पलायन की आशंका से जूझ रहे ग्रामीणों को अब भविष्य की नई दिशा दिखाई दे रही है। किसानों का मानना है कि तालाब भरने से भूजल स्तर में सुधार, मीठे और पीने योग्य पानी की उपलब्धता तथा खेती, पशुपालन और पर्यावरण—तीनों को नया जीवन मिलेगा।
ग्राम प्रधान सहित जनप्रतिनिधियों ने तालाब को लबालब देखकर आश्चर्य और प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष चौधरी की खुले मंच से सराहना करते हुए कहा कि यह कार्य पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणास्रोत है। सिंचाई विभाग से जुड़े प्रारंभिक अवरोधों के बावजूद सुभाष चौधरी ने हार नहीं मानी और जनसहयोग के बल पर इस अभियान को आगे बढ़ाया।
इस अभियान में पूर्व अधीक्षण अभियंता धर्मेंद्र फोगाट, त्रिलोक चंद्र लंबा, सुरेश चंद्र अग्रवाल तथा वर्तमान में गंगा संगठन के मुख्य अभियंता का तकनीकी मार्गदर्शन और सहयोग महत्वपूर्ण रहा, जिससे यह जनआंदोलन मजबूती से आगे बढ़ सका।
मीडिया से बातचीत में सुभाष चौधरी ने कहा कि यह उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि जनता जनार्दन के विश्वास, सहयोग और आशीर्वाद की जीत है। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मीडिया के सहयोग से ही इस अभियान को व्यापक पहचान मिली।
उन्होंने बताया कि यदि यह तालाब नहीं भरा जाता तो क्षेत्र में भूजल स्तर और गिरता, खारे पानी की समस्या गंभीर होती और लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता। आज तालाब में गंगाजल के भराव से यह उम्मीद जगी है कि गांवों का भविष्य सुरक्षित होगा।
यह सफलता अचानक नहीं मिली। वर्ष 2016 से शुरू हुए संघर्ष, वर्ष 2018 में माइनरों की खुदाई, 2019 में पहली बार टेल तक गंगाजल पहुंचना और अंततः 130 मीटर लंबी अंडरग्राउंड कंक्रीट पाइपलाइन के माध्यम से तालाब तक पानी पहुंचाने की लंबी यात्रा के बाद यह सपना साकार हुआ।
आज अभयपुर का यह तालाब केवल पानी से नहीं, बल्कि संघर्ष, विश्वास और जनसंकल्प से भरा हुआ है। यह कहानी साबित करती है कि जब कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से समाज के लिए खड़ा होता है, तो प्रशासन, जनता और प्रकृति—तीनों उसका साथ देते हैं। यह रिपोर्ट केवल एक तालाब भरने की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने और जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाने की प्रेरक गाथा है।

