लेखिका: ललिता चावला
आज बैठे-बैठे अचानक ख्याल आया कि हाउसवाइफ के बारे में कुछ लिखा जाए। भले ही मैं खुद हाउसवाइफ नहीं हूँ, लेकिन समाज का हिस्सा होने के नाते उनकी भूमिका को करीब से देखा और समझा है।
हाल ही में एक पारिवारिक कार्यक्रम में एक सज्जन को कहते सुना— “मेरी वाइफ सिर्फ एक हाउसवाइफ है।” उनके इस “सिर्फ” शब्द ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। क्या सच में एक हाउसवाइफ के लिए “सिर्फ” शब्द सही है?
वह स्त्री जो पूरे घर की जिम्मेदारी उठाती है— बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की देखभाल, परिवार की हर छोटी-बड़ी जरूरत— क्या उसकी भूमिका इतनी छोटी है कि उसे “सिर्फ” कह दिया जाए? वह हर दिन अपनी नींद त्यागकर परिवार के लिए सुबह की शुरुआत करती है, ताकि सबका दिन सही समय पर शुरू हो सके।
कई हाउसवाइफ अपने बच्चों को खुद पढ़ाती हैं ताकि अतिरिक्त खर्च बच सके। घर का खाना खुद बनाती हैं ताकि परिवार को ताजा और स्वस्थ भोजन मिल सके। बाजार के खर्च में बचत करके घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाती हैं। इस तरह वह एक “चलता-फिरता सेविंग अकाउंट” भी बन जाती हैं।
आज के समय में कई हाउसवाइफ उच्च शिक्षित होने के बावजूद घर संभालने का निर्णय लेती हैं। कुछ अपनी इच्छा से, तो कुछ पारिवारिक जिम्मेदारियों या सामाजिक दबाव के कारण अपने करियर को पीछे छोड़ देती हैं। लेकिन इसके बावजूद उनके योगदान को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
हकीकत यह है कि हाउसवाइफ का काम कभी खत्म नहीं होता, लेकिन उसका नाम कहीं दर्ज नहीं होता। उसे सिर्फ “जिम्मेदारी” कहकर टाल दिया जाता है।
अंत में बस इतना कहना चाहूँगी— अगर कोई आपसे पूछे कि आपकी पत्नी क्या करती है, तो यह न कहें कि वह “सिर्फ” हाउसवाइफ है। गर्व से कहें— वह “घर की रानी” है।
क्योंकि एक हाउसवाइफ की सैलरी सिर्फ पैसे नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और अपनापन होती है।

